लखनऊ से बड़ी खबर
शिरोमणि गुरु रविदास विश्व महापीठ Shiromani Guru Ravidas Vishwa Mahapeethका भव्य कार्यकर्ता सम्मेलन और सत्संग सम्पन्न
लखनऊ। 28 सितम्बर 2025, रविवार—भागीदारी भवन, अम्बेडकर पार्क के निकट आज शिरोमणि गुरु रविदास विश्व महापीठ के तत्वावधान में विशाल कार्यकर्ता सम्मेलन एवं सत्संग का आयोजन हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ गुरु रविदास जी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर किया गया।
इस अवसर पर कई प्रमुख जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मंच साझा किया। मुख्य अतिथियों में शामिल थे,
माननीय दुर्गेश कुमार गौतम (पूर्व कैबिनेट मंत्री, उत्तर प्रदेश)
माननीय असीम अरुण जी (मंत्री समाज कल्याण विभाग यू पी सरकार)
माननीय सुरजीत सिंह जी (राष्ट्रीय अध्यक्ष संत शिरोमणि गुरु रविदास विद्यापीठ, कार्यक्रम की अध्यक्षता किशन लाल सिंह (प्रदेश अध्यक्ष) ने की।
दुर्गेश गौतम ने रविदास के जीवंन पर प्रकाश ड़ालते हुए कहा कि
गुरु रविदास जी भारतीय भक्ति आंदोलन के एक महान संत, समाज सुधारक और कवि थे, जिनका जन्म 15वीं सदी के आसपास वाराणसी में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षाओं और जीवन के जरिए समाज में व्याप्त जातिवाद और भेदभाव को चुनौती दी और सभी के लिए समानता, मानवता और प्रेम का संदेश दिया।जीवन व पृष्ठभूमिगुरु रविदास जी का जन्म एक दलित (चर्मकार) परिवार में हुआ था, जिससे उन्होंने खुद सामाजिक भेदभाव और छुआछूत का कड़वा अनुभव किया। इसके बावजूद उन्होंने धर्म और समाज की मुख्य धारा में अपने विचारों से परिवर्तन की लहर पैदा कर दी। उनका मानना था कि ईश्वर की भक्ति में जाति, धर्म या सामाजिक दर्जे का कोई स्थान नहीं है।शिक्षाएं और दर्शनगुरु रविदास जी “एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले को मंदे” जैसे दोहों के माध्यम से भगवान की एकता और सबमें उसकी उपस्थिति का संदेश देते हैं।उन्होंने मूर्तिपूजा, अंधविश्वास और कर्मकांडों का विरोध किया और सीधा, सरल भक्ति मार्ग सुझाया।उनकी नजर में हर इंसान एक समान है; कोई ऊँच-नीच नहीं। जाति और धर्म के नाम पर भेदभाव का उन्होंने स्पष्ट विरोध किया।वे प्रेम, समरसता, मेहनत और ईमानदारी से जीवन जीने का उपदेश देते हैं।उन्होंने “बेगमपुरा” जैसी अपनी रचना में ऐसे समाज की कल्पना की, जहाँ सबको बराबरी, शांति और भयमुक्त जीवन मिले।काव्य एवं रचनाएंगुरु रविदास जी की रचनाएँ सरल हिंदी में हैं, जिनका संग्रह गुरु ग्रंथ साहिब में भी दर्ज है। उनके लगभग 40 पद गुरुग्रंथ साहिब में शामिल हैं। इन रचनाओं में आत्मा की पवित्रता, समाज में न्याय, प्रेम, और भक्ति की महिमा का गहन वर्णन है।प्रभाव और अनुयायीगुरु रविदास जी के शिष्य दूर-दूर तक फैले, जिनमें मीरा बाई जैसी प्रसिद्ध भक्त शामिल थीं। उनके विचारों के असर से रैदासी समाज और अन्य दलित वर्गों ने अपने आत्मसम्मान और अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। आज उनकी जयंती (गुरु रविदास जयंती) पूरे भारत में श्रद्धा के साथ मनाई जाती है।वर्तमान समय में प्रासंगिकताआज जब समाज में भेदभाव और असमानता जैसी समस्याएँ शेष हैं, गुरु रविदास जी की शिक्षाएँ एक राह दिखाती हैं। उनके संदेश—समानता, भाईचारा, मेहनत और सच्चाई—आधुनिक समाज के लिए भी आदर्श हैं, जो सभी को जोड़ने और समझ बढ़ाने में मदद करते हैं।निष्कर्षगुरु रविदास जी ने न सिर्फ धार्मिक एवं सामाजिक चेतना को जगाया, बल्कि करोड़ों लोगों के मन में आत्मविश्वास और समानता का दीपक जलाया! उनके विचार और सिद्धांत आज भी जन-जन को समरसता, प्रेम और सामाजिक न्याय के रास्ते पर मार्गदर्शन दे रहे हैं।
साथ ही मंच पर मौजूद रहे—
मा. सूर्यदेव सारथी, मा. प्रवीण कुमार जी, मा. अनिल कुमार, श्री हरिराम वर्मा, श्री प्रेमपाल, श्री सुरेश चंद्र, श्री कृष्ण कुमार, श्री संतोष पासवान सहित कई अन्य समाजसेवी और महापीठ के वरिष्ठ पदाधिकारी।
सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने गुरु रविदास जी की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुँचाने और सामाजिक समरसता, समानता तथा भाईचारे के संदेश को मजबूत करने का संकल्प लिया।
सुरजीत जी ने संत शिरोमणि रविदास जी की शिक्षाओ पर प्रकाश डाला उन्होंने कहा कि –
संत रविदास जी 15वीं–16वीं शताब्दी के ऐसे महान संत, समाज-सुधारक और भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों में से एक थे, जिन्होंने जाति-भेद, ऊँच-नीच और बाहरी आडम्बर का विरोध कर समानता, प्रेम और भक्ति का संदेश दिया। उनकी शिक्षाएँ आज भी सामाजिक सद्भाव और मानवता के लिए प्रेरणास्रोत हैं। प्रमुख शिक्षाएँ इस प्रकार हैं
- समानता और जाति-भेद का विरोध
संत रविदास जी ने कहा कि ईश्वर की दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं, चाहे उनका जन्म किसी भी जाति या वर्ग में हुआ हो।
उनका प्रसिद्ध संदेश था – “जाति-पाँति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।”
वे मानते थे कि मनुष्य की पहचान उसके कर्म और भक्ति से होती है, न कि जाति से। - भक्ति मार्ग
उन्होंने भगवान के प्रति निष्काम भक्ति पर जोर दिया।
उनका विश्वास था कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग प्रेम और नाम-स्मरण है, न कि बड़े-बड़े यज्ञ या बाहरी अनुष्ठान। - मन की पवित्रता
संत रविदास जी ने कहा कि बाहरी पूजा से अधिक महत्वपूर्ण है हृदय की शुद्धता।
उन्होंने समझाया कि स्वच्छ हृदय और सच्चे विचार से ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। - आत्मनिर्भरता और परिश्रम
वे स्वयं एक चर्मकार परिवार में जन्मे थे और जीवनभर अपने काम को ईमानदारी से करते रहे।
उनका संदेश था कि मेहनत करने वाला हर काम पूजनीय है, कोई काम छोटा-बड़ा नहीं। - ‘बेगमपुरा’ का विचार
संत रविदास जी ने एक आदर्श समाज का सपना देखा, जिसका नाम उन्होंने “बेगमपुरा” रखा—
जहाँ कोई दुख, कर, अन्याय, जाति-पाँति या भेदभाव न हो।
यह समाज सभी के लिए समान, न्यायपूर्ण और सुखी हो।
संत रविदास जी की शिक्षाएँ हमें बताती हैं कि सच्चा धर्म प्रेम, समानता, सेवा और भक्ति में है। उनकी वाणी आज भी सामाजिक भाईचारे, जातीय भेदभाव के अंत और मानवता के लिए मार्गदर्शक है। राजेश निम्मी ने कहा कि संत रविदास जी ने अपने जीवन से यह साबित किया कि समाज में बराबरी, श्रम का सम्मान, जातिवाद का अंत, और स्त्री-पुरुष समानता ही सच्चे धर्म का मार्ग है।
उनके विचार आज भी सामाजिक न्याय, भाईचारे और मानवता की प्रेरणा देते हैं।
कार्यक्रम में प्रदेशभर से आए कार्यकर्ताओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और “आपका हार्दिक अभिनंदन है” के नारों से वातावरण गूंज उठा।अवसर पर डॉ रवि प्रकाश, जय देव, गरीब दास, करण सिंह, बलराम, मदन लाल, राकेश बौद्ध, हरिशंकर,राजेश कुमार, आदि लोग उपस्थित रहे |